*धान उत्पादन की श्री पद्धति डॉ. रामगोपाल यादव* वैज्ञानिक, कृषि विज्ञान केन्द्र- तिसुही,सोनभद्र

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(मुस्तकीम खान सोनभद्र),
उत्पादकता बढ़ाने में गिरता मृदा स्वास्थ्य, उत्पादन लागत में बढ़ोत्तरी, बढ़ता प्रदूषण एवं जल उपलब्धता की कमी आदि मुख्य चुनौतियों के रूप में सामने आ रही हैं । धान का उत्पादन बढ़ाने हेतु मुख्य रूप से निम्न विकल्प अपनाये जा सकते हैं- *1- बीज विस्थापन दर बढ़ाना* *2-एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन* *3- खरपतवार एवं जल प्रबंधन* *4- श्री पद्धति का अंगीकरण* *5- एकीकृतनाशी प्रबंधन* *6-प्रचार प्रसार*। उपरोक्त सभी खूबियां धान उत्पादन की श्री पद्धति में उपलब्ध हैं सामान्य धान उत्पादन प्रौद्योगिकी की तुलना में श्री पद्धति अधिक पैदावार देने वाली है। श्री पद्धति क्या है ? “धान उत्पादन की एक ऐसी पद्धति है जिसमें उत्पादकता, श्रम शक्ति, जल उपयोग दक्षता एवं निवेशक पूंजी की दक्षता एक साथ बड़ा कर पर्यावरण को संरक्षित करते हुए अधिक पैदावार देने की क्षमता है” श्री पद्धति के सिद्धांतों एवं धान उगाने की परंपरागत विधि में अंतर है जैसे- नर्सरी प्रबंधन की तकनीकी, कम अवध की एक-एक पौध प्रति हिल, अधिक दूरी पर रोपाई, देसी खाद का प्रयोग, नियंत्रित सिंचाई, कोनोवीडर या कोई अन्य वीडर के द्वारा खरपतवार प्रबंधन जो भूमि में वायु संचार बढ़ा कर सूक्ष्म जीवों की क्रियाशीलता बढ़ाये। *श्री पद्धति के मुख्य अवयव*- श्री पद्धति धान उत्पादन की तकनीकी न होकर यह पद्धति है जिसके मुख्य अवयक निम्न है- *रोपाई का तरीका*, *यांत्रिक विधि से खरपतवार प्रबंधन।*भूमि उर्वरकता प्रबंधन* *नियंत्रित हल्की सिंचाई।* *श्री पद्धति के सिद्धांत*- सस्य क्रियाओं को अपनाकर प्राप्त निष्कर्षों के आधार पर श्री पद्धति के सिद्धांत निम्न है- *एक पौध प्रति हील की रोपाई।* *8 से 12 दिन पुरानी पौध की रोपाई*। *गोबर की खाद जैविक एवं हरी खाद द्वारा पोषक प्रबंधन*। *25×25 सेंटीमीटर दूरी पर रोपाई*। *सिंचाई प्रबंधन*। *यांत्रिक विधि द्वारा द्वारा निराई- गुड़ाई*। वैज्ञानिक विधियों को अपनाने से पैदा की गई फसल के पौधों में काफी विकसित जड़े अधिक कल्ले एवं मोटे दाने वाली बालियां प्राप्त होती हैं। श्री पद्धति से उगाई गई फसल द्वारा परंपरागत विधि से उगाई गई ।फसल की अपेक्षाकृत 15 से 20% अधिक पैदावार प्राप्त की गई है । इस पद्धति से न केवल अधिक उपज मिलती है बल्कि 90% तक बीज की बचत, भूमि स्वास्थ्य में सुधार, 50% तक सिंचाई जल की बचत, 25 से 30% तक रासायनिक उर्वरक की बचत एवं उत्पादन लागत में कमी की जा सकती है। *श्री पद्धति से धान की वैज्ञानिक खेती*- *मृदा का चयन*-भारी एवं मध्य मृदा में जिसमें सिंचाई तथा जल निकास की उचित व्यवस्था हो वही भूमि उपयुक्त है इस पद्धति में ऊसर भूमि का चयन न करें क्योंकि 8 से 12 दिन की पौध के कारण लवणों का सांद्रण बढ़ने से प्रारंभिक अवस्था में फसल खराब हो जायेगी । जिस भूमि में जैविक तत्व की उपलब्धता कम है एवं निचले क्षेत्र जहां जल भराव की संभावना रहती है वहां पर श्री पद्धति का चयन नहीं करना चाहिए।
*नर्सरी तैयार करना*- नर्सरी तैयार करने में विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता है। श्री पद्धति के अंतर्गत 8 से 12 दिन की पौध रोपी जाती है कम अवधि की पौध के दृष्टिगत आवश्यक है कि नर्सरी से पौध उखाड़ने के बाद अतिशीघ्र रोपाई हो जाए जिससे पौध को विशेष रूप से इनकी जड़ों को सूखने से बचाया जा सके। नर्सरी की मिट्टी को भुरभुरा बनाकर पूर्ण रूप से सड़ी गोबर की खाद को ठीक से मिलाएं। नर्सरी हेतु 4- 6 इंच उठी तथा 4 फुट चौड़ी लंबाई की क्यारियां बनायें। एक हेक्टर क्षेत्रफल की रोपाई के लिए 1000 वर्ग फुट की नर्सरी पर्याप्त होगी। सड़ी गोबर की खाद के प्रयोग से पौध स्वस्थ एवं नर्सरी से आसानी से निकाला जा सकता है। एक हेक्टेयर क्षेत्रफल की रोपाई के लिए नर्सरी तैयार करने हेतु 5 से 6 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है तैयार की गई नर्सरी में बीज को एक समान रूप से बिखेर कर सड़ी गोबर की खाद या मृदा को भुरभुरा कर के बीज को तुरंत ढक दें। बीज को ढकने के लिए पुआल का भी उपयोग किया जा सकता है। बीज को ढक कर सीधे धूप व वर्षा तथा चिड़ियों द्वारा होने वाले नुकसान से बचाया जा सकता है। बीज को 12 घंटे तक पानी में भिगोने के बाद बीज को टाट की बोरी या ढेरी बनाकर बोरी से ढककर 24 घंटे के लिए अंकुरण के लिए छोड़ दें।
*खेत की तैयारी*- ग्रीष्मकालीन जुताई के बाद खेत में रोपाई के 10-15 दिन पूर्व पानी भर देने से पिछली फसल के अवशेष नष्ट हो जाते हैं। खेत की मिट्टी को मुलायम व लेहयुक्त बनाने के लिए पानी भरे खेत की 2-3 जुताई करके पाटा लगाकर खेत को समतल कर देना चाहिए एवं साथ ही साथ रोपाई से पूर्व खेत में मार्कर चलाएं तथा जल प्रबंधन के लिए समतल होना आवश्यक है प्रारंभिक अवस्था में जल निकासी हेतु उचित प्रबंधन किया जाना आवश्यक है। श्री पद्धति के अंतर्गत धान की रोपाई 25× 25 सेंटीमीटर के अंतराल पर उपयुक्त पाई गई है लेकिन स्थानीय परिस्थितियों एवं मृदा की दशा के आधार पर इसमें संशोधन भी किया जा सकता है।
*रोपाई*- परंपरागत विधि से नर्सरी से पौधे खींचकर निकालते हैं परंतु श्री पद्धति के अंतर्गत कम अवधि की छोटी पौध प्रयोग की जाती है ।पौध को खुरपी की सहायता से इस प्रकार निकालते हैं कि पौध में बीज चोल व जड़ों में मिट्टी लगी रहे श्री विधि के अन्तग॔त 8- 12 दिन पुरानी पौध को 25 ×25 सेंटीमीटर की दूरी पर 2 -3 सेंटीमीटर गहराई पर अंगूठे एवं अनामिका अंगुली की सहायता से दबा दें ।और पौधशाला नर्सरी से पौधे निकालने के बाद 30 मिनट के अंदर रोपाई का प्रयास करना चाहिए।
*पोषक प्रबंधन*- फसल के लिए आवश्यक पोषक तत्वों की पूर्ति उर्वरकों के अलावा अन्य सोतों द्वारा भी की जानी चाहिए जिससे फसल उत्पादन लाभदायक होने के साथ-साथ भूमि की उत्पादकता भी टिकाऊ रहे। जैविक खादों के प्रयोग करने से फसलों के पोषक तत्वों की पूर्ति के साथ-साथ भूमि में जीवांश पदार्थ की वृद्धि होती है।जीवांश पदार्थ की वृद्धि से भूमि की गुणवत्ता जैसे पानी धारण करने की क्षमता एवं पोषक तत्वों की उपलब्धता में वृद्धि होती है जिसका फसल के उत्पादन पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ता है खेत की तैयारी करते समय 10 से 15 टन गोबर या कंपोस्ट खाद / हेक्टेयर की दर से खेत में प्रयोग करने से उर्वरकों से दी जाने वाले नाइट्रोजन फास्फेट एवं पोटाश की मात्रा में से 30 किलो नत्रजन, 25 किलो फास्फेट एवं 20 किलो पोटास प्रति हेक्टेयर की बचत की जा सकती है । हरी खाद हेतु ढैंचा की लगभग 35 से 40 दिन की फसल को पलटकर सड़ाने हेतु खेत में पानी भर दें। ढैचा सड़ने में लगभग 10 दिन का समय लगेगा यदि भूमि से सूक्ष्मजीवों की कमी हो तो वह भी गोबर की खाद से पूरी हो जाती है।
*खरपतवार प्रबंधन*- श्री पद्धति के अंतर्गत धान के खेत में विशेष रूप से फसल की प्रारंभिक अवस्था में पानी भरा न रहने के कारण खरपतवारों की अधिक समस्या रहती है । ऊपरी भूमियों में धान में खरपतवार प्रबंधन हेतु यांत्रिक विधि सस्ती एवं उपयुक्त पाई गई है। कोनोवीडर को चलाने के लिए यह आवश्यक है कि पौधों से पौधों एवं लाइन से लाइन की दूरी अधिक हो जिससे दोनों ही तरफ से कोनोवीडर को आसानी से चलाया जा सके । कोनोवीडर के द्वारा खरपतवार मिट्टी में दबने से सड़कर जैविक खाद का काम करते हैं जिससे पौधों को पोषक तत्व प्राप्त होते हैं । कोनोवीडर का प्रयोग करने से मृदा में वायु संचार बढ़ जाता है। वायु संचार में वृद्धि के फलस्वरूप भूमि में मौजूद लाभकारी सूक्ष्म जीवाणु की गतिविधियां बढ़ जाती हैं जो जैविक पदार्थों को शीघ्र सडाकर पौधों को पोषक तत्व के रूप में उपलब्ध कराते हैं ।स्थानीय विधि के अंतर्गत जड़ में वायु संचार बढ़ने से जड़ों का विकास एवं फैलाव अधिक होता है । पौधरोपण के 10 दिन बाद से 10 दिन के अंतराल पर 3- 4 बार कोनोवीडर चलाकर खरपतवारो को प्रबंधन करना आवश्यक एवं साथ ही साथ कोनोवीडर के चलाने हेतु खेत में पर्याप्त मात्रा में नमी होनी चाहिए।
*जल प्रबंधन*- किसानों में आम धारणा यह है कि धान की अच्छी पैदावार हेतु खेत में हर समय जल भरा रहना चाहिए । खेत में पानी देने एवं निकालने की प्रक्रिया में खेतों में दिए गए पोषक तत्वों मुख्य रूप से नत्रजन का जल में घुलनशील होने के कारण जल निकासी के दौरान इसका नुकसान हो जाता है ।अनुसंधान के आधार पर यह ज्ञात हो चुका है कि धान की अच्छी पैदावार के लिए खेत में जल प्लावन की स्थिति बनाए रखना आवश्यक नहीं है। अधिक मात्रा में जल प्रयोग करने से जल व्यर्थ हो जाता है। वातावरण की समस्याओं में वृद्धि करता है तथा उर्वरक उपयोग दक्षता को भी कम कर देता है। ऐसे क्षेत्रों में जहां पहले से ही सिंचाई जल की कमी है कम पानी से धान उगाने वाली विधियां जैसे श्री पद्धति, एरोबिक धान, एवं कुंड में धान उगाना आदि को अपनाने की सलाह दी जाती है । उचित जल प्रबंधन हेतु खेत समतल हो तथा खेतों में क्यारियों के मध्य सिंचाई जल निकास के लिए नालियों का निर्माण अवश्य करें । सिचाई दक्षता बढ़ाने के दृष्टिगत आवश्यक है कि खेत को समतल कर छोटी क्यारियों में विभाजित कर लिया जाए। क्योंकि छोटी क्यारियों में जल प्रबंधन आसान रहता है । फसल की प्रारंभिक एवं वनस्पतिक वृद्धि की अवस्था में खेत में पानी भरकर रखना आवश्यक नहीं है यानी मृदा में हल्की दरारें पढ़ने पर खेत में हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए । धान में पुष्पगुच्छ प्रारंभ होने की अवस्था से फसल की परिपक्वता तक लगभग 2 से 3 सेंटीमीटर पानी बनाए रखने की संस्तुति की जाती है।
*श्री पद्धति से लाभ*- *फसल अवधि में 7 से 10 दिन की कमी*। *उत्पादन में 10 से 30% तक की वृद्धि*। *कम बीज की आवश्यकता*। *कम सिंचाई जल की आवश्यकता*। *स्वस्थ पौध विकास के कारण कीट एवं बीमारियों में कमी* । *उर्वरक उपयोग में 30 से 40% कमी*। *यांत्रिक निकाय से सूक्ष्मजीवों की अधिक सक्रियता के कारण मृदा संरचना एवं मृदा उर्वरता में सुधार*। *श्री पद्धति बीज उत्पादन हेतु अधिक उपयुक्त*। *उच्च गुणवत्ता युक्त उत्पादन*।

वली अहमद सिद्दीकी (प्रधान संपादक)

वली अहमद सिद्दीकी एक वरिष्ठ भारतीय पत्रकार हैं और वर्तमान में crimejasoos.news के प्रधान संपादक हैं। उन्होंने पत्रकारिता में 15 वर्षों से अधिक समय बिताया है और राष्ट्रीय और क्षेत्रीय समाचारों को कवर किया है। वे राजनीति और क्षेत्रीय रिपोर्टिंग, विशेष रूप से उत्तर प्रदेश के सोनभद्र क्षेत्र में, के विशेषज्ञ हैं।
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