चोपन सोनभद्र संवाददाता
( अशोक मद्धेशिया ) कृषि कानून 2020 को पढ़ने एव समझने के बाद यह कहीं से नहीं लगता है किसानों के विरुद्ध है इसमें कहीं ना कहीं राज्य सरकारें एव आढ़तीया को डर है की वर्चस्व समाप्त हो जाएगा अपनी डर को किसानों के हित की बात बता कर किसानों को गुमराह कर रहे हैं यह आढ़तिया पंजाब एवं हरियाणा में ज्यादा है। सरकार द्वारा कृषि क़रारों (कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग) को उल्लिखित किया गया है. इसमें कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिग के लिए एक राष्ट्रीय फ्ऱेमवर्क बनाने का प्रावधान किया गया है.
इस क़ानून के तहत किसान कृषि व्यापार करने वाली फ़र्मों, प्रोसेसर्स, थोक व्यापारी, निर्यातकों या बड़े खुदरा विक्रेताओं के साथ कॉन्ट्रैक्ट करके पहले से तय एक दाम पर भविष्य में अपनी फ़सल बेच सकते हैं.
पांच हेक्टेयर से कम ज़मीन वाले छोटे किसान कॉन्ट्रैक्ट से लाभ कमा पाएंगे.
बाज़ार की अनिश्चितता के ख़तरे को किसान की जगह कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग करवाने वाले प्रायोजकों पर डाला गया है.
अनुबंधित किसानों को गुणवत्ता वाले बीज की आपूर्ति सुनिश्चित करना, तकनीकी सहायता और फ़सल स्वास्थ्य की निगरानी, ऋण की सुविधा और फ़सल बीमा की सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी.
इसके तहत किसान मध्यस्थ को दरकिनार कर पूरे दाम के लिए सीधे बाज़ार में जा सकता है.
किसी विवाद की सूरत में एक तय समय में एक तंत्र को स्थापित करने की भी बात कही गई है.
विपक्ष का तर्क है
कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग के दौरान किसान प्रायोजक से ख़रीद-फ़रोख़्त पर चर्चा करने के मामले में कमज़ोर होगा.
छोटे किसानों की भीड़ होने से शायद प्रायोजक उनसे सौदा करना पसंद न करे.
किसी विवाद की स्थिति में एक बड़ी निजी कंपनी, निर्यातक, थोक व्यापारी या प्रोसेसर जो प्रायोजक होगा उसे बढ़त होगी.
आवश्यक वस्तु (संशोधन) क़ानून 2020
इस क़ानून में अनाज, दलहन, तिलहन, खाद्य तेल, प्याज़ और आलू को आवश्यक वस्तुओं की सूची से हटाने का प्रावधान है. इसका अर्थ यह हुआ कि सिर्फ़ युद्ध जैसी ‘असाधारण परिस्थितियों’ को छोड़कर अब जितना चाहे इनका भंडारण किया जा सकता है.
इस क़ानून से निजी सेक्टर का कृषि क्षेत्र में डर कम होगा क्योंकि अब तक अत्यधिक क़ानूनी हस्तक्षेप के कारण निजी निवेशक आने से डरते थे.
कृषि इन्फ़्रास्ट्रक्चर में निवेश बढ़ेगा, कोल्ड स्टोरेज और फ़ूड स्प्लाई चेन का आधुनिकीकरण होगा.
यह किसी सामान के मूल्य की स्थिरता लाने में किसानों और उपभोक्ताओं दोनों को मदद करेगा.
प्रतिस्पर्धी बाज़ार का वातावरण बनेगा और किसी फ़सल के नुक़सान में कमी आएगी.
विपक्ष का तर्क
‘असाधारण परिस्थितियों’ में क़ीमतों में ज़बरदस्त इज़ाफ़ा होगा जिसे बाद में नियंत्रित करना मुश्किल होगा.
बड़ी कंपनियों को किसी फ़सल को अधिक भंडार करने की क्षमता होगी. इसका अर्थ यह हुआ कि फिर वे कंपनियां किसानों को दाम तय करने पर मजबूर करेगी । किसान बिल (farmers bill) का दूसरा पहलू
ये तीन विधेयक किसानों को बिचौलियों के चंगुल से मुक्त कर सकते हैं, जिन्हें अरथिया भी कहा जाता है। पंजाब और हरियाणा, दोनों प्रमुख कृषि उत्पादक राज्यों की मंडियों में लाखों कमीशन एजेंट किसानों पर अपना नियंत्रण खोने और भारी राजस्व के लिए खड़े होंगे। राज्य सरकारें मंडी कर खो देंगी, उनके लिए भी राजस्व का एक बड़ा स्रोत होगा, यही वजह है कि वे बिलों का विरोध करते दिख रहे हैं।
ये कानून पुराने लोगों के साथ भी दूर नहीं करते हैं और केवल किसानों को अपनी उपज की बेहतर कीमत लेने के लिए विकल्प देते हैं। किसानों के निकायों का मानना है कि नए कानून धीरे-धीरे एमएसपी (न्यूनतम समर्थन शासन) शासन को समाप्त कर देंगे, और राज्य सरकारों के तहत आने वाले एपीएमसी (कृषि उपज बाजार समितियों) को राजस्व का बड़ा नुकसान होगा। उनका यह भी मानना है कि अगर किसान इन कानूनों को लागू करेंगे तो किसान अपनी ही जमीन पर अधिकार खो सकते हैं। जबकि सरकार इस बात की गारंटी दे रही है हम ऐसा किसानों को साथ होने नहीं देंगे और सरकार की बात पर भरोसा भी करना चाहिए कोई भी सरकार कभी भी जनता के हीत की बात ही सोचती है। जब सरकार कानून में लिखित देने को तैयार है कि हम किसानों के साथ कोई भी अन्याय नहीं होने देंगे तो किसानों को भी एक बार इन दलालों बिचौलियों की बातों में ना आकर सरकार की बातों को माननी चाहिए और देखना चाहिए कि आने वाले समय में इससे फायदा है या नुकसान अगर नुकसान है तो आंदोलन के रास्ते खुले हुए हैं । सरकार के प्रस्ताव को किसानों को मान लेनी चाहिए और आंदोलन को समाप्त करना चाहिए जो देश हित में

