वली अहमद सिद्दीकी,
शक्तिनगर, सोंनभद्र,
*राजभाषा हिंदी राष्ट्रीय संस्कृति की संवाहिका* – *डॉ0 योगेंद्र वरुण शंकर तिवारी*
राजभाषा हिंदी हमारी राष्ट्रीय संस्कृति की संवाहिका है, क्योंकि भाषा संस्कृति के संवहन का उत्कृष्ट माध्यम है। एक भाषा के रूप में हिंदी हमारी राष्ट्रीय अस्मिता, जीवनमूल्यों व संस्कारों की संप्रेषिका भी है। अत्यंत सहज व सुगम भाषा होने के साथ ही साथ यह भावाभिव्यक्ति की सर्वाधिक लोकप्रिय भाषा भी है। हिंदी का सांस्कृतिक एकता व पारंपरिक वैविध्य में विशिष्ट महत्व है। हिंदी हमारी व हमारे देश की पहचान है, जिसे हमें अक्षुण्ण बनाए रखना होगा।
हिंदी भाषा की लिपि देवनागरी विश्व की सर्वाधिक वैज्ञानिक लिपि है। इसमें प्रत्येक ध्वनि के लिए एक निश्चित चिह्न का प्रयोग होता है और एक चिह्न एक ही ध्वनि का प्रतिनिधित्व करता है। हिंदी भाषा का इस आलोक में भी अन्यतम विशिष्ट स्थान है कि इसने अन्य भाषाओं के शब्दों को ग्रहण करने में कभी कोई संकोच नहीं किया। समाहार की इसी प्रवृत्ति के कारण ही यह भाषा अत्यंत समृद्ध भाषा होने के साथ ही जनभाषा के रूप में अत्यंत लोकप्रिय है।
आज हिंदी का इन्टरनेट पर निरंतर विकास हो रहा है। गूगल ने भी हिंदी में टाइपिंग के लिए ऐसे टूल विकसित किए हैं, जिनसे अंग्रेजी में टाइप करने पर स्वतः हिंदी के वर्ण आ जाते हैं। फलस्वरूप हिंदी टाइपिंग के प्रति लोगों में रुझान दृष्टव्य है। साथ ही साथ हिंदी के विकास में इसका अहम योगदान रहा हैं, जिसके परिणामस्वरूप आज इन्टरनेट के युग में हमें विभिन्न वेबसाइट के माध्यम से हिंदी में लेख पढ़ने के लिए उपलब्ध हैं। भारत के प्रायः सभी दक्षिणी एवं पूर्वी राज्यों में आज हिंदी को बोला और समझा जाने लगा है, जिस कारण आज हिंदी भारत की मात्र संपर्क भाषा ही नहीं अपितु एक राष्ट्रभाषा के समस्त गुणों से संपन्न भाषा हो गई है।
– डॉ0 योगेंद्र वरुण शंकर तिवारी
शिक्षक,
संत जोसेफ स्कूल,
एनटीपीसी शक्तिनगर।

